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कर्ण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
तेषामनीकानि वृहद्ध्वजानि; रणे समृद्धानि समागतानि |  १   क
गर्जन्ति भेरीनिनदोन्मुखानि; मेघैर्यथा मेघगणास्तपान्ते ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति