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कर्ण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
स तूत्तमौजा निशितैः पृषत्कै; र्विव्याध खड्गेन च भास्वरेण |  १२   क
पार्ष्णिं हय़ांश्चैव कृपस्य हत्वा; शिखण्डिवाहं स ततोऽभ्यरोहत् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति