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कर्ण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
तद्भीमवेगं रुधिरौघवाहि; खड्गाकुलं क्षत्रिय़जीववाहि |  ३   क
अनार्तवं क्रूरमनिष्टवर्षं; वभूव तत्संहरणं प्रजानाम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति