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कर्ण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
रथान्ससूतान्सहय़ान्गजांश्च; सर्वानरीन्मृत्युवशं शरौघैः |  ४   क
निन्ये हय़ांश्चैव तथा ससादी; न्पदातिसङ्घांश्च तथैव पार्थः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति