आश्वमेधिक पर्व  अध्याय २

वैशम्पाय़न उवाच

स कथं सर्वधर्मज्ञः सर्वागमविशारदः |  २०   क
परिमुह्यसि भूय़स्त्वमज्ञानादिव भारत ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति