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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
नातिदूरं ततो गत्वा नगं तालध्वजो वली |  १०   क
पुण्यं तीर्थवरं दृष्ट्वा विस्मय़ं परमं गतः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति