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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
इन्द्रोऽग्निरर्यमा चैव यत्र प्राक्प्रीतिमाप्नुवन् |  १३   क
तं देशं कारपचनाद्यमुनाय़ां जगाम ह ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति