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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
स्नात्वा तत्रापि धर्मात्मा परां तुष्टिमवाप्य च |  १४   क
ऋषिभिश्चैव सिद्धैश्च सहितो वै महावलः |  १४   ख
उपविष्टः कथाः शुभ्राः शुश्राव यदुपुङ्गवः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति