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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
जटामण्डलसंवीतः स्वर्णचीरी महातपाः |  १६   क
हेमदण्डधरो राजन्कमण्डलुधरस्तथा ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति