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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
कच्छपीं सुखशव्दां तां गृह्य वीणां मनोरमाम् |  १७   क
नृत्ये गीते च कुशलो देवव्राह्मणपूजितः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति