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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रकर्ता कलहानां च नित्यं च कलहप्रिय़ः |  १८   क
तं देशमगमद्यत्र श्रीमान्रामो व्यवस्थितः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति