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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽव्रवीद्रौहिणेय़ो नारदं दीनय़ा गिरा |  २१   क
किमवस्थं तु तत्क्षत्रं ये च तत्राभवन्नृपाः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति