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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रुतमेतन्मय़ा पूर्वं सर्वमेव तपोधन |  २२   क
विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति