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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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नारद उवाच
भूरिश्रवा रौहिणेय़ मद्रराजश्च वीर्यवान् |  २४   क
एते चान्ये च वहवस्तत्र तत्र महावलाः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति