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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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नारद उवाच
अहतांस्तु महावाहो शृणु मे तत्र माधव |  २६   क
धार्तराष्ट्रवले शेषाः कृपो भोजश्च वीर्यवान् |  २६   ख
अश्वत्थामा च विक्रान्तो भग्नसैन्या दिशो गताः ||  २६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति