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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा यादवश्रेष्ठः प्रवरं पुण्यलक्षणम् |  ३   क
पप्रच्छ तानृषीन्सर्वान्कस्याश्रमवरस्त्वय़म् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति