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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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नारद उवाच
यदि कौतूहलं तेऽस्ति व्रज माधव मा चिरम् |  ३१   क
पश्य युद्धं महाघोरं शिष्ययोर्यदि मन्यसे ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति