शल्य पर्व  अध्याय ५३

वैशम्पाय़न उवाच

सरस्वती सर्वनदीषु पुण्या; सरस्वती लोकसुखावहा सदा |  ३५   क
सरस्वतीं प्राप्य जनाः सुदुष्कृताः; सदा न शोचन्ति परत्र चेह च ||  ३५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति