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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
स शीघ्रगामिना तेन रथेन यदुपुङ्गवः |  ३७   क
दिदृक्षुरभिसम्प्राप्तः शिष्ययुद्धमुपस्थितम् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति