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वन पर्व
अध्याय ११६
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अकृतव्रण उवाच
रेणुकां त्वथ सम्प्राप्य भार्यां भार्गवनन्दनः |  ३   क
आश्रमस्थस्तय़ा सार्धं तपस्तेपेऽनुकूलय़ा ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति