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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
अभिगम्याश्रमं पुण्यं दृष्ट्वा च यदुपुङ्गवः |  ९   क
ऋषींस्तानभिवाद्याथ पार्श्वे हिमवतोऽच्युतः |  ९   ख
स्कन्धावाराणि सर्वाणि निवर्त्यारुरुहेऽचलम् ||  ९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति