आदि पर्व  अध्याय ५४

सूत उवाच

श्रुत्वा तु सर्पसत्राय़ दीक्षितं जनमेजय़म् |  १   क
अभ्यागच्छदृषिर्विद्वान्कृष्णद्वैपाय़नस्तदा ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति