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आदि पर्व
अध्याय ५४
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सूत उवाच
काञ्चनं विष्टरं तस्मै सदस्यानुमते प्रभुः |  ११   क
आसनं कल्पय़ामास यथा शक्रो वृहस्पतेः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति