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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
एष वृद्धः पुरा लोकान्सम्प्राप्नोति तनुत्यजाम् |  १०   क
तं शीघ्रमनुय़ुञ्जध्वं संशय़ान्मनसि स्थितान् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति