शान्ति पर्व  अध्याय ५४

वासुदेव उवाच

कच्चित्सुखेन रजनी व्युष्टा ते राजसत्तम |  १५   क
विस्पष्टलक्षणा वुद्धिः कच्चिच्चोपस्थिता तव ||  १५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति