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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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जनमेजय़ उवाच
शय़ाने वीरशय़ने भीष्मे शन्तनुनन्दने |  २   क
गाङ्गेय़े पुरुषव्याघ्रे पाण्डवैः पर्युपस्थिते ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति