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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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वासुदेव उवाच
शीतांशुश्चन्द्र इत्युक्ते को लोके विस्मय़िष्यति |  २६   क
तथैव यशसा पूर्णे मय़ि को विस्मय़िष्यति ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति