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आदि पर्व
अध्याय १८४
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वैशम्पाय़न उवाच
ये चान्नमिच्छन्ति ददस्व तेभ्यः; परिश्रिता ये परितो मनुष्याः |  ५   क
ततश्च शेषं प्रविभज्य शीघ्र; मर्धं चतुर्णां मम चात्मनश्च ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति