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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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जनमेजय़ उवाच
काः कथाः समवर्तन्त तस्मिन्वीरसमागमे |  ३   क
हतेषु सर्वसैन्येषु तन्मे शंस महामुने ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति