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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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वासुदेव उवाच
राजानो हतशिष्टास्त्वां राजन्नभित आसते |  ३३   क
धर्माननुय़ुय़ुक्षन्तस्तेभ्यः प्रव्रूहि भारत ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति