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अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
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भरद्वाज उवाच
नृशंसस्त्यक्तधर्मास्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च |  ६१   क
व्राह्मणं चापि जय़तां विसस्तैन्यं करोति यः ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति