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आदि पर्व
अध्याय ३८
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सूत उवाच
तस्य त्वय़ा नरव्याघ्र सर्पः प्राणैर्विय़ोजितः |  १८   क
अवसक्तो धनुष्कोट्या स्कन्धे भरतसत्तम |  १८   ख
क्षान्तवांस्तव तत्कर्म पुत्रस्तस्य न चक्षमे ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति