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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
शरतल्पगते भीष्मे कौरवाणां धुरन्धरे |  ४   क
आजग्मुरृषय़ः सिद्धा नारदप्रमुखा नृप ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति