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सभा पर्व
अध्याय ३३
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्धर्मविदां श्रेष्ठो धर्मराजस्य धीमतः |  २१   क
महाध्वरे महावुद्धिस्तस्थौ स वहुमानतः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति