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अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
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भीष्म उवाच
इत्येवं चिन्तय़ानः स विदितश्च्यवनस्य वै |  ३०   क
सम्प्रेक्ष्योवाच स नृपं क्षिप्रमागम्यतामिति ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति