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अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
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कुशिक उवाच
एष एव वरो मुख्यः प्राप्तो मे भृगुनन्दन |  ३८   क
यत्प्रीतोऽसि समाचारात्कुलं पूतं ममानघ ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति