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अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
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कुशिक उवाच
यदि तु प्रीतिमान्विप्र मय़ि त्वं भृगुनन्दन |  ४०   क
अस्ति मे संशय़ः कश्चित्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति