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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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उत्तङ्क उवाच
चित्तं च सुप्रसन्नं मे त्वद्भावगतमच्युत |  २   क
विनिवृत्तश्च मे कोप इति विद्धि परन्तप ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति