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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
स मामुवाच देवेन्द्रो न मर्त्योऽमर्त्यतां व्रजेत् |  २७   क
अन्यमस्मै वरं देहीत्यसकृद्भृगुनन्दन ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति