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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
अमृतं देय़मित्येव मय़ोक्तः स शचीपतिः |  २८   क
स मां प्रसाद्य देवेन्द्रः पुनरेवेदमव्रवीत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति