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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स तस्मै प्रीतात्मा दर्शय़ामास तद्वपुः |  ४   क
शाश्वतं वैष्णवं धीमान्ददृशे यद्धनञ्जय़ः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति