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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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उत्तङ्क उवाच
विश्वकर्मन्नमस्तेऽस्तु यस्य ते रूपमीदृशम् |  ६   क
पद्भ्यां ते पृथिवी व्याप्ता शिरसा चावृतं नभः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति