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सभा पर्व
अध्याय ५४
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युधिष्ठिर उवाच
मत्तः कैतवकेनैव यज्जितोऽस्मि दुरोदरम् |  १   क
शकुने हन्त दीव्यामो ग्लहमानाः सहस्रशः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति