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सभा पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्येवमुक्ते पार्थेन कृतवैरो दुरात्मवान् |  २१   क
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति