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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
एवं सञ्चिन्तय़न्ती सा वैदर्भी भृशदुःखिता |  १३   क
श्रुतानि देवलिङ्गानि चिन्तय़ामास भारत ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति