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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
सा विनिश्चित्य वहुधा विचार्य च पुनः पुनः |  १५   क
शरणं प्रति देवानां प्राप्तकालममन्यत ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति