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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
हंसानां वचनं श्रुत्वा यथा मे नैषधो वृतः |  १७   क
पतित्वे तेन सत्येन देवास्तं प्रदिशन्तु मे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति