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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
छाय़ाद्वितीय़ो म्लानस्रग्रजःस्वेदसमन्वितः |  २४   क
भूमिष्ठो नैषधश्चैव निमेषेण च सूचितः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति