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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
कनकस्तम्भरुचिरं तोरणेन विराजितम् |  ३   क
विविशुस्ते महारङ्गं नृपाः सिंहा इवाचलम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति