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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
अग्निरात्मभवं प्रादाद्यत्र वाञ्छति नैषधः |  ३०   क
लोकानात्मप्रभांश्चैव ददौ तस्मै हुताशनः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति